प्रयागराज: खेतों के ऊपर से गुजरते हाईटेंशन तारों के साये में अपनी भूमि की उपयोगिता और बाजार मूल्य खोने वाले किसानों के लिए न्याय की एक नई किरण फूटी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसानों के निजी खेतों से गुजरने वाली बिजली की लाइनों के लिए उन्हें उचित मुआवजा देना अब केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य विधिक बाध्यता है।
न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की उन दलीलों को खारिज कर दिया है, जिनके जरिए मुआवजे की मांग को ठंडे बस्ते में डाला जा रहा था। यह फैसला न केवल आर्थिक न्याय है, बल्कि संपत्ति के अधिकारों पर कार्यपालिका की हठधर्मिता के खिलाफ एक बड़ी न्यायिक जीत भी है।
मामले की पृष्ठभूमि: शामली के किसानों का विधिक संघर्ष
यह मामला शामली जिले के चार किसानों के संघर्ष से उपजा है, जिनकी उपजाऊ भूमि पर बिजली विभाग ने हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइन बिछा दी थी। इन खेतों में विशालकाय टावर खड़े किए गए और ऊपर से हाई वोल्टेज तार खींचे गए, जिससे न केवल खड़ी फसलों और पेड़ों को नुकसान पहुँचा, बल्कि पूरी जमीन की व्यावसायिक और कृषि उपयोगिता पर ग्रहण लग गया।
प्रशासनिक अधिकारियों ने खानापूर्ति करते हुए पेड़ों और फसलों का तो आंशिक मुआवजा दे दिया, लेकिन उस गलियारे (Corridor area) के लिए ‘फूटी कौड़ी’ भी नहीं दी जिसके ऊपर से तार गुजर रहे थे। प्रशासन की इस निरंतर अनदेखी और जमीन की घटती कीमतों से व्यथित होकर किसानों ने अंततः हाईकोर्ट का द्वार खटखटाया। उनका तर्क था कि अधिग्रहण न होने के बावजूद उनकी भूमि पर उनके मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए हैं।
हाईकोर्ट का तर्क: ‘अधिग्रहण’ के बिना भी प्रभावित होते हैं मालिक के अधिकार
सुनवाई के दौरान माननीय पीठ ने ‘संपत्ति के अधिकार’ और उसके व्यावहारिक उपयोग पर गहरी विधिक टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी खेत के ऊपर से हाईटेंशन लाइन गुजरती है, तो वह जमीन मालिक के लिए ‘मृत’ प्राय हो जाती है। कोर्ट ने अपने तर्कों में निम्नलिखित विधिक बिंदुओं को रेखांकित किया:
- उपयोगिता पर प्रतिबंध: जिस भूमि के ऊपर से तार गुजरते हैं, वहां किसान न तो कोई स्थायी निर्माण कर सकता है और न ही भविष्य में बड़े फलदार वृक्ष लगा सकता है।
- बाजार मूल्य में गिरावट: ऐसी विवादित या हाईटेंशन लाइन के नीचे आने वाली जमीन की बाजार दरें रातों-रात गिर जाती हैं, जिससे किसान को भारी आर्थिक क्षति होती है।
- विधिक विसंगति: भले ही भौतिक रूप से भूमि का अधिग्रहण न किया गया हो, लेकिन कानून की नजर में भूमि के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना भी मालिक के अधिकारों का हनन है, जिसके लिए मुआवजा अनिवार्य है।
मुआवजे का नया गणित: 2015 बनाम 2024 के नियम
कोर्ट ने इस बात पर विशेष बल दिया कि मुआवजा केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा निर्धारित नवीनतम मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने 15 अक्टूबर 2015 के पुराने दिशा-निर्देशों और 14 जून 2024 को जारी संशोधित आदेशों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। 2024 के नए नियम मुआवजे की राशि में एक बड़ी छलांग पेश करते हैं, जिसे राज्य सरकार नजरअंदाज कर रही थी।
मुआवजा संरचना का तुलनात्मक विश्लेषण:
| क्षेत्र का प्रकार | 15 अक्टूबर 2015 के नियम | 14 जून 2024 के संशोधित नियम (अनिवार्य दरें) |
|---|---|---|
| टावर बेस क्षेत्र (जहाँ टावर स्थापित है) | पूर्व निर्धारित मानक दरें | भूमि के बाजार मूल्य का 200% |
| RoW (राइट ऑफ वे) कॉरिडोर (तारों के नीचे की पट्टी) | प्रशासनिक विवेक पर आधारित | भूमि के बाजार मूल्य का 30% |
राज्य सरकार के ‘चयनात्मक रवैये’ पर तीखी फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपनाए जा रहे ‘चयनात्मक रवैये’ (Selective Approach) की कड़ी निंदा की। अदालत ने पाया कि सरकार अपनी सुविधा के अनुसार पुराने (2015) आदेशों का हवाला तो देती है, लेकिन जब बात किसानों को अधिक लाभ देने वाले 14 जून 2024 के नए आदेशों की आती है, तो उन्हें सिरे से खारिज कर दिया जाता है।
माननीय न्यायाधीशों ने इसे “मनमाना व्यवहार” करार देते हुए कहा कि राज्य एक कल्याणकारी संस्था है और वह अपने नागरिकों (विशेषकर किसानों) के साथ इस तरह का विधिक भेदभाव नहीं कर सकता। सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह लाभकारी नियमों को लागू करने में देरी करे या उनसे इनकार करे।
अंतिम आदेश और विधिक समय सीमा
न्याय के हित में एक बड़ा कदम उठाते हुए हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2026 के उस प्रशासनिक आदेश को निरस्त (Quash) कर दिया है, जिसके तहत किसानों को मुआवजा देने से मना किया गया था। अदालत ने राज्य सरकार को सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि:
- 14 जून 2024 के केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए।
- सभी पात्र किसानों को गणना के आधार पर बकाया मुआवजे का भुगतान 4 सप्ताह के भीतर सुनिश्चित किया जाए।
17 अप्रैल 2026 को सुनाया गया यह निर्णय भविष्य में उन हजारों किसानों के लिए एक ‘नजीर’ (Precedent) बनेगा जिनकी जमीनें विकास की लाइनों के नीचे दबी हुई हैं। अदालत ने यह संदेश साफ कर दिया है कि बुनियादी ढांचे का विकास अन्नदाता की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
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